स्कूल छोड़ना शायद ही कभी कोई फ़ैसला होता है। यह छोटी-छोटी कमियों का जमाव है — फटा बस्ता, अधूरी कॉपियाँ, छोटी पड़ चुकी यूनिफ़ॉर्म — जो इतनी बढ़ जाती हैं कि पढ़ाई जारी रखना परिवार के लिए सबसे महँगा विकल्प लगने लगता है।
पहल के शिक्षा अभियान ठीक इन्हीं छोटी कमियों पर काम करते हैं। पाठ्य-सामग्री, कॉपियाँ, स्टेशनरी और स्कूल किट सीधे ग्रेटर नोएडा के कम-आय वाले परिवारों के बच्चों तक पहुँचाई जाती हैं — किसी सूची पर भेजकर नहीं, बल्कि समुदाय के बीच हाथों-हाथ। सैकड़ों विद्यार्थियों को पूरे सेट मिले हैं — इतने कि बच्चे को घर बैठाने वाला बहाना ही ख़त्म हो जाए।
यह न छात्रवृत्ति का पैसा है, न तस्वीर के लिए किया गया दान। यह वह ठोस, बिना दिखावे वाली चीज़ है जो एक नौ साल के बच्चे को सोमवार को उसी सामान के साथ कक्षा में लौटा देती है जो बाक़ी बच्चों के पास है।
पाठ्य-सामग्री का एक सेट परिवार के एक बार बाहर खाने से भी सस्ता है। आपका सहयोग बच्चे को वहीं बनाए रखता है जहाँ उसे होना चाहिए — पढ़ाई में।
Anyone can plant a tree. The harder promise is to protect it for two years — so we hand each sapling to someone who will.
Between residents and the officials who serve them, there is often no room where they simply talk. Our public-dialogue programmes are that room.
A simple idea on a public wall: leave what you can spare, take what you need. No forms, no questions, no queue of shame.